नन्हा पौधा

9:31 AM Posted by Shanker Bakshi


भावनाओं के अंकुर से
अकंषाओं की सिचाई से
प्रस्फुटित हुआ
एक नन्हा पौधा
अस्चर्या जनक रूप से बढ़ता हुआ
स्तब्ध रह गया मैं
अलोकिक सुन्दरता को देखकर
चाहे अनचाहे उगा था
इसलिए हर्षित हो रहा था
इस उपलब्धि पर

सहज सुंदर
सबसे अलग
रोजाना देखता था
पल-पल बढते हुये
सौंदर्य की विभिन्य मुद्राओं मैं
निखारते हुए
अनुपम छठा बिखेरते हुये

कल्पना करता था
खिलने वाले फूलों की
सपने से बुनने लगा था मैं
छूना चाहा कई बार
डर जाता था
स्पर्श से मुरझा जाये
फूल खिले
आशा के विपरीत
काले, भद्दे, कुरूप

विस्मित हुआ और दुखी भी
सुंदर से दिखने वाले उस पौधे की
इस परिणिति पर
आँखों मैं गड़ने से लगे थे
वे बेरौनक फूल

उखाड़ फेंका
कुंठित भाव से

नादान

8:17 AM Posted by Shanker Bakshi


मनो मेरी बात
विशवास करो
विशवास करो कि मैं नादान हूँ
फिर कहते क्यों हो
यह तो दिखाई देने वाली शय है
उन्हे परिभाषा भी तो मालूम हो
जिन्हे बताओगे
वे जान पयेगै तब
अर्थ मालूम होगा जब
देखा होगा, महसूस किया होगा
फिर किसे बताओगे
अपने आप को
या फिर अपने ही जैसे किसी को
जिसे ढूंढ़ना होगा भीड़ मैं
सबसे अलग , असाधारण
उससे कहना
कि तुम नादान हो

इसे बचाना भी है मुश्किल
मुझे मालूम है
कुछ दिनों मैं
वैसे दिखने लगोगे तुम
जैसे दीखते है सब
साथ कोई हो
जो प्रेरणा दे
टोके, गलती करने पर

संपर्क करोगे
बहार निकलोगे
कैसे कैसे रंग
अन्तर हो जाएगा फिर
तुममे और उसमें
तुम्हे सायद कई मिल जायें
पर उसे मुश्किल से मिले हो तुम

अंतहीन दिशाहीन तलाश
मुश्किल से मिले हो
इसलिए मिलकर रहो
बहार मत जाना
ताकि रंग डालें लोग
सम्भव है
अपनी दुनिया बनाना
जिसमें कुछ सीमित लोग हों
सब सफ़ेद
आपस मैं एक दूसरे से कहें
हम सब नादान हैं
मुश्किल से मिले हो
इसलिए मिलकर रहो
और उनसे कहो
कि तुम नादान हो
फूलों कि तरह
बच्चो कि तरह


चित्र जेनन_जेनन द्वारा

फर्क

7:53 AM Posted by Shanker Bakshi


फर्क है हममैं और उनमें
हम जब बोलते हैं - तब बोलतें
वे जब चुप होतें हैं
तब भी बोलते हुए से लगते है

फर्क है हममें और उनमें
हम जब चलते है तो एक भीड़ का निर्माण करतें है
वे जब चलते हैं
तो दूसरे कई लोग रुक जाते है

फर्क है हममें और उनमें
हम बात करते है - तो पहले एक भूमिका बांधते है
वे अभी कुछ बोल भी नहीं पाते
कि लोग उनकी बातों का मतलब भी जान लेते हैं

फर्क है हममें और उनमें
हम जीते हैं - क्योंकि हमें जीना है
वे जीते हैं
क्योंकि दूसरे कई लोगो को अभी जीना है
चित्र पैट्रिक दोहेन्य द्वारा

तुम

9:13 AM Posted by Shanker Bakshi

साहस के छूटने पर
सपनो के टूटने पर
आशाओं के डूबने पर
जिन्दगी से ऊबने पर
तुम आना और आकर मुझमें
एक नई शक्ति भर जाना

मुश्किलों के आने पर
ग़म के बादल छाने पर
इच्छाओं के मरने पर
जिन्दगी से डरने पर
तुम आना, और आकर मुझमें
एक नई शक्ति भर जाना,

सांसों के घटने पर
उमीदों के हटने पर
विडंबनाओं में फसने पर
तुम आना और आकर मुझमे
एक नई शक्ति भर जाना,

सपनों के महल ढहने पर
आंसुओं के बहने पर
अपनों के मुह फेरने पर
दुखों के घेरने पर
तुम आना, और आकर मुझमें
एक नई शक्ति भर जाना,

नियति के हंसने पर
विडंबनाओं के जाल में फसने पर
इच्छाओं के मरने पर
जीवन से डरने पर
तुम आना, और आकर मुझमें
एक नई शक्ति भर जाना,

मन के चंचल होने पर
चित् में हलचल होने पर
यादों के मन में बसने पर
संस्मरणों के डसने पर
तुम आना, और आकर मुझमें
एक नई शक्ति भर जाना,

चित्र जाकी बेर्कोपेक द्वारा

फार्मूले

8:38 AM Posted by Shanker Bakshi

चुनावों के दौरान
दौड़-दौड़ कर काम करना
भाग-भाग कर उदघाटन करना
चीख-चीख कर भाषण देना
राजनीतिजौ की राजनीती के
फार्मूले हो जाते हैं
पर जाने क्यों
चुनाव जीतने के बाद
ये सभी
लंगडे और लूले हो जाते हैं

एहसास

6:42 AM Posted by Shanker Bakshi


मैं वाह वाही के पत्तल पर
अभिमान की जीब से,
प्रसंशा की जूठन चाटता हूँ,
पर मर गया हूँ या जिंदा हूँ
देखने के लिए कभी - कभी
ख़ुद को चकोटी काटता हूँ

सड़क पे पड़ी लाश देखकर, कन्नी काट जाता हूँ
मरे हुए लोगो का भी रुपया खा जाता हूँ
बाढ, आग, भूकंप से , फायदा उठाता हूँ
जितना मिलता है, उससे ज्यादा कमाता हूँ
काले-गोरे लोगो को लाठियाँ थमाता हूँ
ख़ुद को गोरों का रक्षक, कालों का मसीहा बताता हूँ

कोट पैंट पहन कर, भीख मांगने जाता हूँ
कुर्ता धोती पहन कर साधू बन जाता है
लोगो की भीड़ में मैं, चीखता चिल्लाता हूँ
मेरे आगे कोई रोये , तो मैं नींद में खो जाता हूँ
मैं मदारी के जैसा हूँ , मजमा लगता हूँ
पर मैं खेल दिखता नहीं , ख़ुद खेल जाता हूँ
राजनीती की सतरंज में, मेरे माप दंड दोहरे हैं
मेरी बिसात में दो चार नहीं, नब्बे करोड़ मोहरे हैं

में खुशिओं के प्यासे लोगो में
आंसू से भीगी पलकों में
झूंठें सपने, आशाओं आँकाक्षाओं को बांटता हूँ
पर मर गया हूँ या जिंदा
देखने के लिए कभी-कभी
ख़ुद को चकोटी हूँ


चित्र म्क्कय्सवागे द्वारा


चार आंखें

11:29 PM Posted by Shanker Bakshi



दूर जाता पलायन कर , मन ये चंचल
रोकता है टोकता है, एक बंधन चार आंखें
आंसुओं से सनी हुई , मोम की सी बनी हुई
देखती हैं एक स्वपन को, ढूँढती है अपने पन को
चार आंखें

जगता है, भागता है, अभिरणय में और वन में
ढूंढता है अंजुली भर , सुधा जल को
जो भुला दे बन्धनों को क्रन्दनो को
निशा थक के सो गई है, नींद में यह खो गई है
छोड़ आया तोड़ आया - एक सपना चार आंखें
बंद थी दिन की थकन से
देख पी न मुझे
पर देखती थी उस समय जो
एक स्वपन को अपने पन को

सनसनाती है हवा , जो बह रही विपरीत मेरे
चीरता हूँ खोजता हूँ, मार्ग अपना, ले के सपना
याद आया थी लगी ठोकर मुझे
जब चला था मैं "दिया" घर का
दिया था न ध्यान जिसपर
टीसता है - पीसता है अब जो मन को

चित्र कुदुमोमो द्वारा